Friday, May 20, 2011

ASAATA VEDNIYA KARMA- A SHORT DISCUSSION

असाता वेदनीय कर्म

जो कर्म हमें दुखी होने के लिए प्रेरित करे...दुखी करने के निमित्त बनाये,वह कर्म असाता वेदनीय कर्म है..अतः हमें यह कहना चाहिए की जब तक "असाता वेदनीय" कर्म का उदय नहीं आता है,तब तक संसार की कोई भी शक्ति चाहे कोई भी हो,हमें दुःख नहीं दे सकती है,यह पहली लाइन में "प्रेरित" शब्द इस लिए लगाया है क्योंकि कोई भी कर्म हमें रुलाता नहीं है,या हंसाता नहीं..कर्म सिर्फ हसने,या रोने के लिए प्रेरित करते हैं..यह तोह हमारा पुरुषार्थ है की हम उस असाता कर्म से प्रेरित हो जाएँ..और रोने लगें,लेकिन कोई भी कर्म रुलाता नहीं..सिर्फ प्रेरित करता है.."मुनिमहाराज भी तोह बुखार अदि,रोगों की सहन करते हैं,तोह वह क्या रोते हैं?..अगर कर्मों का काम रुलाना होता तोह वह भी रोते..इससे सा जाहिर है..की कोई भी कर्म रुलाता,या हंसाता  नहीं है सिर्फ प्रेरित करता है.असाता वेदनीय कर्म रोने के लिए,दुखी होने के लिए प्रेरित करता है.

कैसे बंधता है और कैसे बचें  असाता वेदनीय कर्म से.

१.अपने दुःख में दुखी होने से-
जब भी हमारे ऊपर कोई  भी,किसी भी प्रकार का,चाहे मानसिक जो,चाहे शारीरिक हो या किसी अन्य प्रकार का दुःख हो...हम अगर दुखी होते हैं तोह असाता वेदनीय कर्म का बंध होता है.
कैसे बचें-
१.जब हमारे ऊपर कोई दुःख आये हमें चाहिए हम समता भाव रखें -यानी की भूत की बातों को भूल जायें..जैसे पहले मैं स्वस्थ था,अब बीमार हूँ,पहले इतना अच्छा था,अब कुरूप हो गया हूँ,और भविष्य के बारे में सोचना बंद कर दें,जैसे की "आगे जाके ठीक होऊंगा या नहीं" "अगर मैं ऐसा ही रहा तोह यह काम नहीं हो पायेगा"ऐसा हो जायेगा,वैसा हो जाएगा..ऐसा करने से हम अपने दुःख को बढ़ाते ही हैं,न की कम करते हैं..कभी सुना है की कोई व्यक्ति बीमार है और वह रो रहा है तोह उसका बुखार कम हो जाता है..उल्टा बढ़ और जाता है".

२.ऐसा मन में श्रद्धान करें की "यह सब तोह मेरे अशुभ कर्मों का फल है,जब कर्म कर रहा था,तब तोह बड़ा आनंद आ रहा था,अब क्यों दुखी हो रहा हूँ?,अब कर्मों का स्वाद चखने को मिल रहा है,अब क्यों दुखी हो रहा हूँ,मैंने अपने दुःख का इंतजाम भी तोह खुद ही किया था,अब इस दुःख में और दुखी होकर और दुःख का इंतजाम क्यों करूँ"

३.हम ऐसा भी सोच सकते हैं "की यह तोह असाता वेदनीय कर्म का फल है,और कर्म तोह पुद्गल है..जिसको एक दिन नष्ट होना ही है..आज नहीं तोह कल यह कर्म फल-देकर चला जाएगा,दुखी होने से क्या लाभ?"

४.ऐसा श्रद्धान करें "की मैं जीव हूँ,मेरा स्वाभाव जानना और देखना है,दर्द तोह शरीर में हो रहा है..मेरे तोह नहीं हो रहा है,अगर मैं दुखी होता हूँ तोह "जीव तत्व का विपरीत श्रद्धान करूँगा ..फालतू में पाप बांधूंगा"

५.जब भी दुःख हो यह भजन गाये "हूँ स्वतंत्र निश्चल निष्काम,ज्ञाता दृष्ट आतम राम,जो मैं हूँ वह हैं भगवान,मैं.....)
6.ऐसा श्रद्धान रखें की"मैं पिछले भवों में नरक में था..वहां कितना दुःख सहन किया,कभी त्रस हुआ..तोह कितना दुःख सहा,अज्ञानता के कारण..अब मैं दुखी क्यों हो रहा हूँ,उल्टा यह दुःख तोह कुछ भी नहीं है.

२.दूसरा कारण है दुसरे के सुख में दुखी होना

जो दुसरे के सुख में दुखी होते हैं..उन्हें तोह तीर्थंकर भगवान भी सुखी नहीं बना सकते...क्योंकि उनके लिए कितना भी कर दो..वह दुखी ही होंगे...क्योंकि वह दुसरे से चिड़ते रहेंगे..और असाता वेदनीय कर्म का बांध करेंगे..यानि की अपने पैर पे खुद ही कुल्हाड़ी मारेंगे.


कैसे बचें-

१.ऐसा विचारें-मेरे पास जो भी है,मेरे अपने कर्मों की वजह से है..इसके पास जो है..वह उसके शुभ-अशुभ कर्मों की वजह से है...जब तक मेरा शुभ का उदय नहीं आएगा ..मुझे कुछ मिल जाएगा क्या,नहीं मिलेगा..तोह मैं दुखी क्यों हो रहा हूँ.

२.एक बार को सोचें की "मैं अपने कारण से कितना दुखी हूँ,और दूसरों के सुख से,या उन्हें देख कर कितना दुःख हूँ,जवाब स्वत ही मिल जायेगा.

३.ऐसा श्रद्धान रखें की"मैं पिछले भवों में नरक में था..वहां कितना दुःख सहन किया,कभी त्रस हुआ..तोह कितना दुःख सहा,अज्ञानता के कारण..अब मैं दुखी क्यों हो रहा हूँ,उल्टा यह दुःख तोह कुछ भी नहीं है.

दूसरों को दुखी करना

किसी भी अन्य प्राणी ,चाहे वह चीटिं हो,तितली हो,कुत्ता हो,बिल्ली हो..को चाहे मानसिक रूप से,शारीरिक रूप से या अन्य किसी वजह से दुःख देना,और शरीर को बेफाल्तू में दुःख देना ..असाता वेदनीय कर्म में बंध का कारण है.

कैसे बचें

१.ऐसा एक पल को सोचें "की कोई मेरे को इस तरह से मारा तोह क्या मुझे दर्द नहीं होगा,अगर जवाब हाँ होगा,तोह हाथ रुक जाएगा"
२.ऐसा श्रद्धान करें "की इसके अन्दर भी तोह मेरे जैसा आत्मा तत्व है,मैं इसको क्यों चिढ़ा रहा हूँ,क्यों परेशां कर रहा हूँ,क्यों खोटी,खोटी बोल रहा हूँ..यानी की दर्शन विसुद्धि भावना भाने की कोशिश हम सब कर सकते हैं.

शोक करने से

किसी हितैषी,किसी अन्य जान पहचान वाले की मौत के बाद रोना,दुःख मानना,दुखी होना..तथा बेफाल्तू में हुंकार-हुंकार कर के रोना ....शोक कहलाता है और इससे बड़ा भारी असाता वेदनीय कर्म बंधता है.

कैसे बचें
१.ऐसा सोचें यह तोह जीव था,मारा तोह शरीर है..शरीर तोह है ही नश्वर आज नहीं तोह कल जाता ही,आज नहीं तोह कल मुझे भी इस शरीर को त्यागना है और अगले भव की तैयारी में लगना..शरीर के मरने से कोई मरता नहीं है..इस रिश्तेदार की क्या है यह अगले जन्मों में फिर से मिल जाएगा...तोह मैं फ़ालतू में दुखी क्यों हो रहा हूँ?

२.किसी निजी की मरण को शिक्षा के रूप में लें...और ऐसा सोचें की बताओ इतना सब कुछ इकठ्ठा किया,जिस शरीर के लिए इकठ्ठा किया वह तोह जलकर राख हो गया..अब बचा क्या?..अब मुझे भी कुछ ऐसा करना है जिससे मैं बचूं

अनिष्ट संयोग और इष्ट के बियोग से दुखी होने से

कोई प्रिय वस्तु खो गयी,हम दुखी हो रहे हैं...किसी अनिष्ट बात का संयोग हो गया..जैसे किसी दुश्मन से मिल्लिये,ख़राब पडोसी मिल गया,अच्छे भाले में लाइट चली गयी,फलाना काम नहीं हो पाया..इन सब बातों के लिए बेफाल्तू में दुखी होना,शरीर को दुःख में डालने से ,और अपने साथ-साथ औरों को दुःख में डालने से असाता वेदनीय कर्म का बंध होता है..और साथ की साथ आत्र ध्यान भी होता..जो नरक गति का कारण है

कैसे बचें
१.यह वस्तु तोह पर की है..मेरी थोड़े ही न है..जो मैं दुखी हो रहा हूँ,पुद्गल पदार्थ मुझे दुःख नहीं दे सकते,यह तोह मेरा अपना राग-द्वेष है जिसकें कारण मैं व्यर्थ में ही दुखी हो रहा हूँ,मैं चहुँ तोह न भी होऊं दुखी..अशुभ कर्म भी तोह मैंने किया...यह राग-द्वेष तोह प्रकट ही दुःख दाई हैं..तोह पुद्गल के वियोग में दुखी होने वाली बात ही क्या है आखिर?.
२.मैं तोह दर्शन ज्ञान स्वभावी हूँ,यह मुझे दुःख दे ही नहीं सकते...

जानवर अदि पालना
किसी जीव को बंधन में रखने से बहुत ज्यादा असाता वेदनीय कर्म और अन्तराय कर्म का बंध होता है..क्योंकि हर जीव सुख चाहता है..दुःख नहीं चाहता,बंधन नहीं चाहता,चाहे उस जीव को पिंजरे में रखकर कितना भी सुख दे दो,वह जीव सुखी नहीं रह पाता है...हम आदिनाथ भगवन का उदहारण ले सकते हैं,जब उन्हें कर्मों ने नहीं छोड़ा तोह हम क्या चीज हैं.
अन्य कारण
बेफाल्तू में दुखी होना,झंझटों में पड़ना,बेफाल्तू की चिंता करना,मसलों में पड़ना,हिंसा नदी,परिग्रह नंदी,मिशा नंदी ,चौर्य नंदी रौद्र ध्यान,हिंसा अदि पाप,अभक्ष्य पदार्थ खाने से  ,कठोर शब्द कहने से,कुशील अदि पाप करने से,विषय-कषायों में लीं होने से...असाता वेदनीय कर्म का बंध होता है...और यह अत्यंत दुःख दाई है

लिखने का आधार-मुनि क्षमा सागर जी महाराज के कर्म सिद्धांत पर प्रवचन (पार्ट-८) ( लिखने का आधार प्रवचन है,बहुत सारे विचार मरे निज के हैं..इसलिए कोई गलती हो तोह बताएं.

जय जिनेन्द्र




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